Wednesday, April 10, 2024

छाया शाह *"सख्य"*

नववर्ष 

पती पती देखो कैसी कोंपलें फुटी है,
धरती को सजाने सारी प्रकृति जुटी है।

धूले प्रेम के रंग में यह नववर्ष कहेलाता, 
चैत्री एकम निले वस्त्र पे गुलाबी बुटी है।
 
मंगलमय स्वागत हो मौसम है अलबेला,
कोयल गा रही, प्रकृति सज के लूटीं है।

हो जग का उत्थान लगे स्वर्ग समान,
हरी भरी धरती लगती स्वर्ण में घूंटी है।

सभ्यता अपनी "सख्य" देती है बधाई नववर्ष की, 
स्फटिक सी संस्कृति प्रकाश पुंज कोटी है।

छाया शाह *"सख्य"* मुंबई

प्रियंका प्रियदर्शिनी

*चैत्र नववर्ष*

नव उमंग है . नव तरंग है .
नव संदेश का नव उत्कर्ष है । 
नव चेतन है . नव स्पर्श है .
आ चुका अब नया वर्ष है।
गेहूँ की लहराती खेतों से .
इस धरा का रूप सवर्ण है।
सृष्टि के सृजन कार्य को .
करने को आतुर नव संवतसर है।
पेड़ों और पौधो पर खिल रहा .
अब नव रूप श्रृंगार है।
आम ने अपने नन्हें टिकुलों से भरा आंगन और द्वार है ।
प्रभु की अराधना माँ का अवाहन .
सूर्य उपासना से स्फूर्ति संचार है।
चैत्र मास हिन्दू नव वर्ष की
उत्पत्ति का आधार है।

प्रियंका प्रियदर्शिनी
रांची

अनिल पांचाल सेवक

*नव वर्षाभिनंदनम्*   🌈
*विक्रम संवत २०८१,*🌈
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*स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा*
*अभिनंदन नववर्ष तुम्हारा*
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*देकर नव प्रभात विश्व को*
*हरो त्रस्त जगत अंधियारा*
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*हर मन को दो तुम आशा*
*बोलें सभी प्रेम की भाषा*
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*समझें जीवन की सच्चाई*
*पाटे सब कटुता की खाई*
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*जन-जन में सद्भाव जागे*
*घर घर में फैले उजियारा*
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*मांगें प्रदाता से हम ये वर*
*प्रसन्न रहे हम जीवन भर*
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*स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा*
*अभिनंदन नववर्ष तुम्हारा*
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*अनिल पांचाल सेवक*✒️
=====उज्जैन=======👉

रंजुला चंडालिया कुमुदिनी

10/4/24
     हिन्दू नव वर्ष
          गुलाबी आभा सा आदित्य 
        हुआ ,
         दिनकर  , की उर्वशी सी 
      प्रकृति की छवि का साक्षात्कार हुआ ।
   रश्मि रथी के रथ से नव वर्ष का 
    मंगल गान हुआ ।
    श्रद्धा  इड़ा की लज्जा से कलियों का परिधान हुआ ।
   आम्र तरुओं की मंजरियों से 
      रसाल समीर का पान हुआ।
  लहलहाती फसलों व  पत्ती पत्ती
    पर सुखद तरुणायी का आगाज हुआ ।
   नवयौवना के मुस्काते अधरों पर
     खिलती कलियों का राज हुआ
    नव वर्ष का हर ओर  मंगल गान हुआ ।
  तपती धरती पर श्रम सीकर का 
   वर्षण होने पर ,
    अन्न धन धान्य समृद्ध हुआ ।
  चैत्र नवरात्र की महिमा का अवतार हुआ ,
   मां दुर्गा के नौ रूपों का 
        गुण गान हुआ।
द्वारा -- रंजुला चंडालिया कुमुदिनी महाराष्ट्र से

प्रणीता प्रभात

मंच को नमन 🙏
विषय - भारतीय नववर्ष

भारतीय नववर्ष शुभ मंगलमय हो...... 
नई पहल से शुभारंभ हो ,
कठिन जिंदगी सरल सहज हो ,
भारतीय नववर्ष शुभ मंगलमय हो..... 
अनसुलझी जो रह गई बातें ,
नववर्ष में उनका भी हल हो , 
सिन्दूरी भोर लिए आए नव वर्ष ,
सबके लिए सुनहरा पल हो ,
भारतीय नववर्ष शुभ मंगलमय हो..... 
नई सुबह की नई धूप में ,
नई आशाओं की नई किरण हो , 
भूले सारी कड़वी यादें ,
हर ओर प्रेम सौहार्द्र की जय हो, 
भारतीय नववर्ष शुभ मंगलमय हो...... 
स्नेहिल सूरज बांटे नई-नई सौगातें ,
हवाएँ भी मीठे गीत गुनगुनाते , 
चहूँ ओर खुशियों की बहार हो, 
भारत का भविष्य स्वर्णिम - सुखद हो 
भारतीय नववर्ष शुभ मंगलमय हो......, 
 
स्वरचित 
प्रणीता प्रभात
फरीदाबाद , हरियाणा

अपराजिता रंजना

शीर्षक-नव वर्ष नया हर्ष
***********
चैत्र तुम नव वर्ष लेकर नया हर्ष खुशियों के साथ 
  इस बार आना।
नया जोश नया उत्साह
सबके दिल में जगाना।
आँधी आये,तूफान आये
चाहे छाये अन्धेरा।
 प्रकाश रखे जो मन 
  के अंदर 
 वहीं सवेरा लाना।
पग- पग पर गिरना
पर तुरंत सम्भलना।
लड़खड़ाते कदमों को
खुद ही मजबूत करना।
लाख मुसीबत आ जाये
प्रेरणा खुद ही बनना।
नव वर्ष इस बार नया जोश मन में भरना।
विजेता चलते एक राह
एक राह के राही बनना।
अधूरे सपनें पूरा करना।
इरादों को फ़ौलाद बनाना।
लक्ष्य रहे मंजिल को पाना।
असंभव है,यहाँ बहुत कुछ
अपने हौसलों से संभव करना।
नया वर्ष नयी ऊर्जा देना।
जग का अन्धेरा करना दूर।
मशाल लेकर हाथों में चलना।
आसमां भी होगा तेरा
 एक दिन।
खुद पर यकीन बनाये रखना।
नव वर्ष खुशियों की वर्षा करना।
**********
स्वरचित मौलिक 
अपराजिता रंजना 
पटना (बिहार)

डॉ. लूनेश कुमार वर्मा

*नए साल का लक्ष्य* 

आया है साल नया
 तुम्हें मुबारक हो मेरे यार 
आए साल नया हर साल
लाये दामन में अपनी
 खुशियाँ समेटे हजार
बगिया यूँ ही महकती रहे
आती रहे जीवन में बहार
 समय कर रहा है पुकार 
हो जाओ होशियार 
आया है साल नया
यूँ तो आती रहेंगी बहारें 
जाती रहेंगी बहारें
आयेगा न कभी 
लौट के समय तुम्हारा
जो करना है तुम्हें ही करना है 
ठान लो आज ही
अवसर आया है बड़ा ही पावन 
मौका हाथ से निकल न जाए
सोच लो, समझ लो
हो जाओ होशियार
लक्ष्य को बाँध लो 
पकड़ लो
कमर कसकर हो जातो तैयार
अब लगाना है तुम्हें ही अपनी नैया पार।

डॉ. लूनेश कुमार वर्मा
       डॉ. लूनेश कुमार वर्मा जन्म- 17-05-1977। जन्म स्थान- घोटिया, तह.पलारी, जिला- बलौदा बाजार (छत्तीसगढ़)। माँ श्रीमती रामप्यारी वर्मा, बाबूजी डॉ. टेकराम वर्मा। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग में व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं।
आपने एम.ए. संस्कृत, बी.एड., एम.ए. हिंदी, एम. ए. भाषा विज्ञान, केंद्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा, एम.ए. प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व, डिप्लोमा इन इंग्लिश, एम.फिल. हिंदी, पीएच.डी. हिंदी किया है। शिक्षा क्षेत्र में आपका 19 वर्षों का शिक्षण अनुभव है।
आपका शोध विषय "समकालीन कहानी लेखन के संदर्भ में उदय प्रकाश की कहानियों का साहित्यिक अनुशीलन" है। आपने उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानी 'मोहनदास' का संस्कृत अनुवाद 'मोहनदास:' (2022) और 'तिरिछ' कहानी का संस्कृत अनुवाद 'तिरछ:' (2023) किया है। हिंदी कविता संग्रह ‘जीवन एक नदिया है’ (2023), हिंदी हाइकु संग्रह ‘खिलता पुष्प’(2023), गीना काव्य मंजूषा साझा संग्रह (2023), गीना लघुकथा साझा संग्रह (2023) आपकी कृतियाँ हैं।
आपने राष्ट्रीय और अंताराष्ट्रीय अनेक कार्यशालाओं, सेमिनार-वेबीनार में भाग लिया है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में संस्कृत-हिंदी-छत्तीसगढ़ी आधारित 55 से अधिक शोध परक लेख-आलेख प्रकाशित हुए हैं।
छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल रायपुर, राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद छत्तीसगढ़ शंकर नगर रायपुर, शासकीय शिक्षा महाविद्यालय रायपुर, डाइट रायपुर, संस्कृत विद्यामंडलम् छत्तीसगढ़, संस्कृत भारती इत्यादि संस्थानों में विविध अकादमिक गतिविधियों में आपकी सक्रिय सहभागिता रहती है।

डॉ. लूनेश कुमार वर्मा (व्याख्याता)
मोबाइल नंबर- 8109249517
म.नं. 3349(रामालय) वार्ड- 61
काजल किराना के पास
शुक्ल वंशम के पीछे, 
रावतपुरा कालोनी फेस-01
मठपुरैना. पोस्ट- सुंदर नगर 
तह+जिला- रायपुर (छत्तीसगढ़)
पिन 492001 
ई मेल- luneshverma@gmail.com

डॉ० विमलेश अवस्थी

🌻 नव वर्ष🌻
बधाई नव वर्ष की l
महकें जीवन उपवन का कुंज - कुंज I
प्रस्फुटित हो प्रबल प्रताप का प्रकाश पुंज ।
दिशि दिशि धवलिमा फैले नवल उत्कर्ष की I बधाई नव वर्ष की l
सफलता सहचरी
संचरण करती रहे ।
विजय वैजयन्ती सदा, वरण करती रहे ' ।
झर झर झरती रहे, मन्दाकिनी सुखद हर्ष की ।
बधाई नव वर्ष की ।
सत्यमेव जयते का मंत्र घहराता रहे ।
युगों तक व्योम में,
तिरंगा लहराता रहे ।
भीति ढह जाये, दुख
दैन्य संघर्ष की l
बधाई नव वर्ष की ।
2️⃣
वैदेशियत ने कुछ बनाया, इस तरह से दास अपना l
भूलते हम जा रहे है
स्वर्णमय इतिहास अपना ।
लोक जीवन सभ्यता,
संस्कृति हम भूल बैठे
विश्वव्यापी चेतना, हुंकृति हम भूल बैठे ।
भूल बैठे आश्विन, फाल्गुन, मधुमास अपना ।
भूलते हम जा रहे है स्वर्ण मय इतिहास अपना ।
हिन्द में ही हिन्द वासी, बन रहे हैं अल्पसंख्यक ।
और बढ़ते जा रहे,
मक्का मदीने के प्रशंसक ।
भारती करवा रहे है विश्व में उपहास अपना ।
भूलते हम जा रहे हैं, स्वर्ण मय इतिहास अपना ।
लो शपथ अब हम जियेंगे, सिर्फ हिन्दू के लिए ।
शम्भु बनकर विष पियेंगे, सिर्फ हिन्दू के लिए,
अन्यथा विमलेश समझो निकट सर्व विनाश अपना ।
भूलते हम जा रहे है, स्वर्ण मय इतिहास अपना I
रचना मौलिक व अप्रकाशित
डॉ० विमलेश अवस्थी
कासगंज ( उ० प्र० )

वर्षा शिवांशिका

चैत्र  नवरात्रि :२०८१
🌷☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️🌷

दिन आज का सृष्टि की रचना,  
आज ही दिन सूर्य का उदय होना I 

चैत्र नए वर्ष के रूप उल्लास आया, 
कहीं गुडीपड़वा व् उगादी कहलाया I

घर अंगना सजा आज मनोहारी गुडी, 
आज फिर लौट आई नई उगादी I 

चौकट आम के पत्तों की बंदनवार, 
इन्द्रधनुषी रंगोली बनी सत्कारI   

नव दुर्गे का सुन्दर स्वरुप निराला, 
त्रिनेत्री, श्रृंगार में पहने पुष्पित माला I

भजते गाते ख़ुशी मिले सागर से, 
माता का आव्हान करे उर से I

आदि ,अनादी, अनंता तू ही कल्याणी ,
मेरे घर आंगन पधारो माता भवानी I

नव वर्ष मंगलमय करे सकल कार्य 
नवल प्रगती का पथ बने सरल सोंदर्य I

माता का आशीष अपार,प्रेम बरसो  अखंड  
सुख, समृद्धि व् विजय का हो भूखंड I

 वर्षा  शिवांशिका

रूपेश कुमार

नया साल नया दौर
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जीवन के हर रंग मे खुशियो के संग में ,
सुबह की लाली घटा शाम की तन्हाई में ,

हरे भरे पेड़ों पर चिड़िया चहकती रहे ,
खेत खलिहानों मे फसल लहलहाती रहे ,

नई रोशनी मे नये जीवन की शुरुआत हो ,
सबको जीने की नई दिशा नया राह मिले ,

ऐसा नया हो नये साल की शुरुआत हो ,
नये साल मे नये दौर की हमेशा  जज्बात हो ,

दुनिया मे आपस मे भाईचारे का संबंध हो ,
ना झगड़ा ना झंझठ और ना लड़ाई का वास हो ,

गाँव मे खुशियों की हमेशा नई - नई सौगात हो ,
सबको अपनी अभिव्यक्तियों का नया संसार मिले ,

प्रेम की ज्योति जले खुश्बुओं की हमेशा महक उठे ,
विज्ञान , तकनीकी , साहित्य की ज्वाला और जले ,

पग -पग में दिल और प्यार का हमेशा मिलन हो ,
जाति धर्म को मिटाकर सबकी धड़कनो का मिलन हो,

दुनिया मे लोक कलाओं का चहुंदिश विकास हो ,
सभ्यता और संस्कृति का नया आयाम नयी गति मिले ,

मन मस्तिष्क मे नये दुनिया की स्वागत की आशाएं हो ,
जीवन मे नये उद्देश्यों का नया अध्याय की शुरुआत हो ।

रूपेश कुमार 
चैनपुर, सीवान, बिहार

Tuesday, April 9, 2024

@ विजय डांगे

☘️चैत्र नव वर्ष☘️
चैत्र ,नव वर्ष आज सम्मान।
 गुड़ीपाड़वा ,सनातन शान।।

 आम्र वृक्ष कोयल सुर गाए।
 स्वर मधुरा आगमन सुनाये। 
 वासंती मधुशाम।।१।।

 रवि किरणों की दिव्य शोभा।
प्रातः सुनहरी अवनी आभा।
 झरना मंगल गान।।२।।
ब्रह्मा किन्ही सृष्टि उत्पति।
चौरासी जीवन की दृष्टि।
आध्यात्मिक गुरु ज्ञान।।३।।

चैत्र,नाम क्रोधी, संवतसर।
नवरात्रि, श्रीराम प्रभुवर।
 जन मन प्रिय श्रीराम।।४।।

 अभिनंदन संवत्सर नूतन।
  आज अयोध्या आनंद जनमन।
 गूंज विजय श्री राम ।।४।।
गुड़ी पाड़वा ,सनातन श्याम।

@ विजय डांगे 

प्रिया प्रसाद

नूतन वर्ष
गाती प्रकृति गीत नयी
लेकर हर्षोल्लास उमंग नयी
त्यौहार हमारा साल नयी
फागुन रंगीन गा रही गीत नयी
नव प्रतिपदा हर्ष नयी
त्योहार हमारा कामना मंगलमई
उठ चुकी जीवन,ऊर्जा नयी
सूर्य हुआ प्रबल तो
गाती प्रकृति गीत नयी
मधुर मुधर गूंजन संग
कलियों में राग नयी
पंखुड़ियां खिलने को बेताब
आ चुका नव वर्ष मना रहा प्रकृति,त्यौहार नयी
धरा बनी दुल्हन सब भाव नयी
किरणों संग संगम दिखा रही नदीयां
अद्भुत है पूर्ण भाव भरी
शाख शाख है बसंत बहार
कलरव सुनाती पंक्षीयां
उसकी हर राग नयी
हवाएं झुला रही डालियां
फूलों की बरसात नयी
नव वर्ष है उत्साहित
जन - जन गा रही संगीत नयी

© प्रिया प्रसाद 

डॉ. कन्हैया साहू 'अमित'

16 -12-15 मात्राभार
नवगीत - स्वागत भारतीय नववर्ष

मौसम जब मधुमास बना तो,
स्वागत भारतीय नववर्ष। 

बाग बगीचे सुमन सजीले,
मंद-मंद सब महकें।
परम प्रीत की पाकर परिमल,
कीट पतंगा बहकें।
मधुकर जब बदमास बना तो,
स्वागत भारतीय नववर्ष।-1

तापमान सम मनहर मौसम,
सबको सहज सुहाते।
सरसो सेमल टेसू महुआ,
बरबस पथ भरमाते।
आम दिवाने खास बना तो,
स्वागत भारतीय नववर्ष।-2

चैत्र शुक्ल की प्रथम दिवस पर,
घर-घर में खुशहाली।
नूतन कोंपल वृक्ष लता पर,
अभिनव है हरियाली।
नयन अमित सुखदास बना तो,
स्वागत भारतीय नववर्ष।-3

सर्जक- डॉ. कन्हैया साहू 'अमित'
शिक्षक- भाटापारा छत्तीसगढ़
चलभाष- 9200252055

सर्वाधिकार सुरक्षित सामग्री ©®

शालिनी श्रीवास्तव ‘सनशाइन’

*हिन्दू नववर्ष*

बसंत बीता, फागुन बीता,
चैत्र  की नवरात्र है आई।
हिन्दू विक्रम संवत्सर की,
हार्दिक- हार्दिक बधाई। 
          घर-घर  तोरण द्वार सजाओ, 
          सब मिलकर मंगल धुन गाओ।
          मां अम्बे का आराधन  कर,
          सुख, स्वास्थ्य, समृद्धि पाओ।
नव दुर्गा का करके वंदन,
नूतन वर्ष  का अभिनंदन,
मना रही यह सारी सृष्टि
राम जन्म का सुंदर उत्सव। 
          कुंदन सी धरती दमक रही,
          गेंहू की बालियां लहक रही।
         अमिया सेआम की डाल लदी,
          कोयल बगिया में कुहुक  रही।

महुआ से उपवन महक रहा
पपीहे नें शोर मचाया है,
मौसम की इस अंगड़ाई से
तन मन में आलस आया है।
          किन्तु न तुम आलस्य करो
          उठ जाओ मनुज तुम कर्म करो,
          ब्रम्हा ने सृष्टि की रचना की  
          तुम भी जीवन को सुफल करो।

स्वरचित अप्रकाशित 
शालिनी श्रीवास्तव *सनशाइन*
गोरखपुर  उत्तर प्रदेश।

शरीफ़ खान

*चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भारतीय हिंदी नववर्ष*

भारत धरा बसंती बयार युक्त होकर,
पूरा देश एक सूत्र है इस रोज़।
अवनि और अंबर हर्षित होकर, 
बह रही बयार सुगंधित इस रोज।

दशों दिशाएं पुलकित हैं, 
भारत भूमि के गीत गा रहीं इस रोज।
देख छटा इस पुण्य धरा की , 
प्रकृति श्रंगारित कर रही है देश इस रोज़।

जय जवान, जय किसान का नारा 
समृद्ध कर रहा भारत को इस रोज।
उत्तर-दक्षिण,पूरब-पश्चिम एकता के सूत्र में 
बांध रहा नव वर्ष इस रोज।

उत्साह, उमंग से तरंग उठाता, 
कर्त्तव्य बोध जगाता ये नव वर्ष इस रोज।
 पुण्य धरा प्रत्येक घर में, 
धन-धान्य की खुशहाली लाती इस रोज।

भारत भूमि सतरंगी होकर, 
परिधान पहन हर्षाती इस रोज।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा नव वर्ष, 
बयार हो जाती सुगंधित इस रोज।
बसंत बहार फागुनी रंग पाकर  
अवनिअंबर मुस्काता इस रोज़।                         

स्वरचित कृति: शरीफ़ खान, 
रावतभाटा, कोटा, राजस्थान।

*हिंदू नव वर्ष विक्रम संवत उत्सव पर*

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत 
नूतन वर्ष से हर्षित हो सबका जीवन,                                  आशा की नवीन किरणें, खिले मन, 
नवीन सपनो से भर दे जीवन।                      

रंगीन उत्सव , मिठास भरा 
प्रेम और खुशियों से घिरा तन मन।
सभी मनाएं खुशियों का जहां,
साथ चलें हर व्यावसायी और किसान।

नवीन उमंग, नया संघर्ष, 
नव संवत्सर के हर लम्हा में आशियान।
जीवन को सजीव, सपनों को साकार, 
कर दे संकल्प नूतन ।
                 
नव वर्ष की आए सौगात , 
खुशियों का रंग, नव संभावनाओं का संगम। 
प्रेम, शांति, आनंद की बौछार से 
हर दिन नव रंग, नव उमंग।
नव वर्ष की सुगंधित लहरें, 
ताजगी भरे मन से प्रफुल्लित हो अंतर्मन।   

स्व रचित कृति द्वारा: 
शरीफ़ खान 
रावतभाटा कोटा राजस्थान।।

श्रीमती नीना श्रीवास्तव

हिंदू नववर्ष मंगलमय हो

    चैत्र शुक्ल की प्रतिप्रदा को हम नव वर्ष मानते है
गुड़ी पड़वा चैत्र नवरात्रि को नया वर्ष  हम कहते हैं

  टेसू महुआ फूले चारो और 
है प्रकृति का शोर 
नव वर्ष मनाने  देवी देवता आए 
धरा पर नाचे दादुर मोर

नव पल्लव कोपल कालिया 
प्रफुल्लित  फूले  पराग 
कुहू कुहू कोयलिया बोले
 गए नित नए मधुर राग 

ढोल नगाड़े दुंदुभी और बजे घुघरू की मधुर आवाज 
नो रूपो में माता आई  हिन्दू 
नव वर्ष मानते आज

नव दुर्गा मां घोड़े पर सवार होकर
दिव्य धारा पे अवतरित हो गई 
नव वर्ष के स्वागत करने को 
परियां लताओं सी बन  लिपट गई
 

बशुंधरा महकी फूले आम के बोर
तितली भंवरा  नाचे घूमे चारो ओर
लगे गूंजने मां के मंदिर चारो ओर नव वर्ष मनाए खुश  होकर  

नवयोवन करके  श्रंगार 
ऐसे नाचे धारा में आज 
सुंदर  धवल चांदनी जैसे
छिटक रही  ठंडी चले बयार
नव वर्ष का स्वागत करने 
जैसे आई  अपशारा आज 


कवि दिनकर है बड़े महान 
कविता  लिखकर देते ज्ञान
नही मानते पाश्चात्य। नववर्ष
करते है नही  स्वीकार  
चैत्र शुक्ल की प्रतिप्रदा को 
हम नव वर्ष मानते है 
हम नव वर्ष मानते है 



स्वरचित कविता 
  श्रीमती नीना श्रीवास्तव 
जबलपुर  मध्य प्रदेश। 
८ / ४ / २००२४

Sunday, April 7, 2024

शारदा राम मालपानी

राष्ट्रकवि दिन सम्मान २०२४ के लिए प्रेषित रचना....

🖊️🌹 शीर्षक....... नव वर्ष  की अगवानी

गत वर्ष अब बीत गया है
आई नववर्ष की भोर सुहानी
आओ हम सब मिलकर करें 
नववर्ष की करे  हम अगवानी ।1। 

नव वर्ष‌‌ देखो लेकर आया है 
नई उमंगे एवम  नई आशाएं
नव उम्मीद और नए सपने 
हम अपनी आंखों में सजाए। 2 ।
 
मां महालक्ष्मीजी भरे  तिजोरी
हर ख्वाहिश हो हमारी पूरी 
सभी धर्म मिलकर रहे यहां पर
कोई कामना  ना रहे अधूरी । 3 ।

आरोग्य सभी का रहे अच्छा 
योगा प्राणायाम  हररोज करें
दीन दुखियों की मदद करें  हम
सबकी झोली खुशियों से भरे । 4।

नव वर्ष में हर घर-परिवार में
सुयश खुशियों के फूल खिले
बिछड़े हुए  सभी परिजनों के
आपस में दिल से दिल मिले  । 5।

चेहरे पर हो  प्यारी सी मुस्कान 
 ग़मगीन उदासी ना छाये
जीवन की  हर प्रभात नवचेतना
 नई उमंग लेकर के आए । 6 l

आओ हम सब मिलकर गाए
 नए साल के  नए-नए तराने 
दुखद गत वर्ष अब बीत गया 
भूला दीजिए सब किस्से पुराने । 7‌।

**************************** *****
🖊️🌹 सौ  शारदा राम मालपानी अमरावती .महाराष्ट्र
(विकर्णी)©️®️

सूबेदार रामस्वरूप कुशवाह

  ((नूतन वर्ष))
हर वर्ष की तरह,
ऐ वर्ष भी आ गया,
नई उम्मीद नई उमंग,
नया उत्साह भर गया।

गुड़ी पड़वा का स्वागत,
बड़ी धूमधाम से किया,
सुबह से घर सफाई,
आंगन चौक पुराईं,
सभी को नीम गुड़,
का प्रसाद दिया।।

नीलकंठ के दर्शन,
विक्रम संवत नव वर्ष,
की शुरुआत।
बही-खाता नये साल का ,
स्वरूप बदलों चलन,
अपने अंग्रेजी ख्याल का।।

सनातन को पहचानों,
प्रकृति प्रदत्त है ऐ वर्ष,
मूल से जुडो और,
करों हर्ष।।
सूबेदार रामस्वरूप कुशवाह बैंगलौर कर्नाटक
०४/०४/२०२४

राजन कार्तिकाय

राष्ट्रकवि दिनकर सम्मान 2024 के लिए प्रेषित रचना।
 
!!विक्रम संवत्(2081)प्रकाश!!

नवल वर्ष है, नवल हर्ष है,
होगा अब उत्कर्ष नवल।
छोड़ जीर्णता को चमकेगा, 
अपना भारत वर्ष नवल।।

सम्राट विक्रमादित्य ने ही, 
संवत्सर नया बनाया था। 
जब आक्रमक दुष्ट भयंकर, 
शत्रु शकों को हराया था।।

चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा से, 
नव संवत्सर हुआ सबल। 
नवल वर्ष है, नवल हर्ष है,
होगा अब उत्कर्ष नवल।।

राष्ट्रकवि दिनकर जी ने भी,
ईसवी सन ठुकराया है।
विक्रम संवत को ही अपना,
संवत्सर बतलाया है।।

विक्रम संवत चैत्र चंद्रमा,
चांदनी-सम सिद्ध धवल।
नवल वर्ष है, नवल हर्ष है,
होगा अब उत्कर्ष नवल।।

चैत माह में ही सृष्टि का,
ब्रह्मा ने निर्माण किया।
चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से,
शुरू सृष्टि का गान किया।।

हिंदुओं का विक्रम संवत,
निज नव वर्ष कहलाता है।
जो वसंत के साए में ही,
उर-उत्कर्ष बढ़ता है ।।

प्रथम माह यह चैत्र मानव,
उर में भरता प्रेम- प्रबल ।
नवल वर्ष है, नवल हर्ष है,
होगा अब उत्कर्ष नवल।।

----स्वरचित एवं मौलिक----

राजन कार्तिकाय 
हिन्दी-शोधार्थी 
पाटलिपुत्र विश्व विद्यालय पटना,बिहार 
Rajankan220387@gmail.com

भेरूसिंह चौहान "तरंग"

*नया साल ये आया है*
____________________

दीप जले हैं घर - आँगन में
परचम भी लहराया है ।
खुशियों की सौगात मिली है
नया साल ये आया है ।।

नए वर्ष में वृक्ष लगाएं
धरती का श्रृंगार करें ,
रंग - बिरंगे इंद्रधनुषी
सपनों को साकार करें ।
चहुंओर है लहर हर्ष की 
सबके दिलों पर छाया है ।
खुशियों की सौगात......।।

नाच रहे हैं मोर - पपीहा 
जब कोयल गीत सुनाती है ,
चमक रहे हैं भाल कृषक के
फसलें खेतों में लहराती है ।
मस्त पवन में झूमें फसलें
मानो यौवन भी इठलाया है ।
खुशियों की सौगात.....।।

गत वर्ष में हुई गलतियॉं
नहीं हमें दोहराना है ,
नई उमंग हो , नई तरंग हो
नया जोश भी लाना है ।
मंथन - चिंतन करना सबको
क्या खोया - क्या पाया है ।
खुशियों की सौगात.....।।

पथ में कॉंटे लाख अगर हो 
नहीं जीवन में घबराना हैं ,
हार मिले या जीत मिले 
हमें फिर भी गले लगाना है ।
नहीं रूकेगा आज क़दम ये
जो आगे क़दम बढ़ाया है ।
खुशियों की सौगात .....।।

नफ़रत की जो आग लगी है 
उसको आज बुझाना है ,
मानवता का दीप - दिलों में 
मिलकर आज जलाना है ।
नहीं बुझेगा दीप - दिलों का 
जो तुमने आज जलाया हैं ।
खुशियों की सौगात .... ।।

*_____________________________*

(मौलिक स्वरचित रचना)

भेरूसिंह चौहान "तरंग"
४,रोहिदास मार्ग, झाबुआ
ज़िला - झाबुआ (मध्य प्रदेश)
पिन : ४५७६६१
मो. नंबर : ७७७३८६९८५८
*______________________________*

डॉ. सुषमा तिवारी

शीर्षक - नव वर्ष का सूरज
नए वर्ष का सूरज उगने वाला है
लाल-केसरिया लालिमा में रंगा है,
धीरे-धीरे आसमान में चढ़ रहा है
स्वर्णिम आभा को फैलाने वाला!

प्रभात के नव किरण को देखने
उत्सुक मनवाले उधर देख रहे हैं,
आशा - दीप जला हाथ जोड़कर 
मंदस्मित मंत्रोच्चारण कर रहे हैं।

कौन है वह सूरज से आगे बढकर 
कौन है उस नभ से भी कहीं ऊपर,
प्रकृति की ऊर्जा-स्रोत साधने वाला
मानव का दीपक बन जलने वाला!

बिना विराम नित्य वह चलने वाला
आशा-आकांक्षाओं से परे रहनेवाला,
सभी को सदैव संदेश यह देने वाला
कर्म से बढ़कर न कोई भाग्यविधाता!

आओ, नव वर्ष में भी करें यह प्रण
नहीं छोड़कर भागेंगे कभी यह रण,
नित्यकर्म के दीप से करेंगे आरती
आशीष देती रहेंगी हमें मांँ भारती।

कविता - ©®डॉ. सुषमा तिवारी
नोएडा, गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश

डॉ माया एस एच

विषय: नया साल
७ अप्रैल २०२४

स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा,
आओ, नव ज्ञान के लिए,
महान जागृति के इस युग में,
सकारात्मकता से दिव्य ज्योति जलाने के लिए।

स्वागत! नये युग का नया साल,
थके हुए का उत्थान करो संभव ,
मानवता के एक नए संगठन के लिए,
प्रेरक गीत तुम गाओ कुछ भी ना लगे असंभव ।

स्वागत है नूतन वर्ष इस देश की क्रांति के लिए, 
सदियों से उपनिवेशवाद ने पीसा है, 
मेहनतकश किसान के केवल मृत विचार ही बचे हैं, 
श्रमिकों को नया जीवन देना अब संवैधानिक है ।

स्वागत है नव वर्षा तुम्हारा, 
पकती रोटी के मिट्टी के चूल्हे की खुशबू यही कहे, 
कि भूखा ना सोये कोई माँ के आँचल में, 
धरा ये हमारी यही दबी छिपी अभिलाषा चाहे।



स्वलिखित सर्वाधिकार सुरक्षित 

-डॉ माया एस एच 
पुणे 
(महाराष्ट्र)

विरेन्द्र जैन

राष्ट्र कवि दिनकर सम्मान हेतु रचना 

शीर्षक : नव वर्ष
दिनांक : ०७/०४/२०२४

नव वर्ष के नव पटल पर खुशियों के नव गीत सजाएँ,
नयी धरा पर सपनों के कुछ नए नवेले बीज बिछाएं !!
 
नव दिवस की उर्जाओं संग न केवल नए लक्ष्य बनायें,
पुराने प्रणों में जान फूंककर नयी खुशबुओं से महकाएं !!

निराश ना हों उदास ना हों पुनरावलोकन का कदम उठाएं,
चूक गए जिन भी लक्ष्यों से, नव आत्म विश्वास से पुन: जुट जाएं!!
 
किंतु पहुंच से दूर क्षितिज सा अस्तित्व विहीन ना लक्ष्य बनाएं,
पांव धरातल पर रखे रहें औ फ़लक छू लेने का ख़्वाब सजाएं !!

आभासी दुनिया से निकल अब परिजन मित्रों के समीप आएं,
रिश्ते जो पीछे छूट गए कहीं, उनमें प्रेम की नव ऊष्म बहाएं !

नकारात्मकता के गहन अंधेरे जब जब मानस पटल पर छाएं,
श्रद्धा से होकर समर्पित सकारात्मकता के दीप जलाएं !

विगत काल में अधूरी रह गईं जो पूरी करें मन की अभिलाषाएं,
बीत रहा अनमोल यह जीवन हर पल इक उत्सव मनाएं!!

ईश्वर से है यही कामना सुख शांति समृद्धि बरसायें,
दें इतनी शक्ति जग में सबको दुखों पर सारे विजय पायें !!

विरेन्द्र जैन नागपुर
स्वरचित एवम् मौलिक

Saturday, April 6, 2024

कमल पटेल

यही तो है मेरा नया साल
_________________________
सृष्टि के नव श्रंगार का,
संदेश दे रहा देश-काल।
हां यही तो है, मेरा नया साल।।
कहीं गुड़ी पड़वा, कहीं नवरेह,
कहीं चेटीचंड, तो कहीं युगाधी‌।
उत्सव ये नया नहीं, 
परंपरा है आदि।।
पेड़, पौधे, पुष्प, लताएं, 
सुनाते हैं जिसका हाल।
हां यही तो है, मेरा नया साल।।(१)

यह सृष्टि की आरंभ तिथि,
आदिकाल की यही है रीति।
भारत भूमि से, राजा विक्रम ने,
शक हूणो को दिया था निकाल।
हां यही तो है, मेरा नया साल।।(२)

गुरु अंगद देव का जन्म हुआ,
प्रगट हुए झूलेलाल।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने,
लाया वैदिक काल।।
पंचांग आरंभ और शक्ति आराधन से,
हुआ यह जगत निहाल|
हां यही तो है, मेरा नया साल||(३)

विक्रम संवत, दो हजार इक्यासी।
दुनिया तेरे, दरस की प्यासी।।
गुडी, सजाने, ध्वजा लहराने,
तोरण द्वार सजाने के
स्वप्न से  हुआ मै निहाल।
हां यही तो है, मेरा नया साल।।(४)

स्वरचित-
© कमल पटेल चकरावदा।
उज्जैन (मध्य प्रदेश)

प्रभु पग धूल

दोहा
छंदाधारित मुक्तक
-----------------------------
1-
चैत्र-शुक्ल की प्रतिपदा,
इक्यासी-है बीस।
शुचित-गुड़ी पड़वा हरे,
रोग-दोष छत्तीस।।
हिंदी के नव-वर्ष में,
मिली मित्र नव-रात्रि।
देता हूँ शुभ-कामना,
कटें-कष्ट चालीस।।
2-
ऋतु बसंत की साथ में,
रही चैन-सुख घोल।
नहीं-देर का काम है,
राधा-मोहन बोल।।
पावन-हिंदी वर्ष है,
पावन-है मधुमास।
ब्रम्हा-जी ने आज ही,
रची-सृष्टि-अनमोल।
3-
हिंदी के नव-वर्ष पर,
छोडो काले-कर्म।
दीनों-की सेवा करो,
खिले-पुष्प सा धर्म।।
मद-पावक से दूर रह,
करे-आप को भस्म।
धर्म-पुण्य करते रहो,
पाकर-प्रभुपग मर्म।।
4-
मंगल-राजा प्रेम से,
ले-आये नव-वर्ष।
मंगल-ने मंगल किया,
भरा-सृष्टि में हर्ष।।
झूम-झूम कर नाचिये,
छाया सुखद-बसंत।
मंगल-राजा कह रहे,
नित्य-करो-उत्कर्ष।।
-----------------------------
प्रभुपग धूल

मनीषी सिन्हा

नव संवत्सर 
——————
प्रखर रश्मियाँ कर रहीं आवाहन 
मंगलमय हो नववर्ष का आगमन 
चैत्र प्रतिपदा शुक्लपक्ष है पावन 
माँ दुर्गा का नवरात्रों में शुभागमन
नव संवत्सर स्वागतम !
नव संवत्सर स्वागतम !

द्वार पर लहरे धर्म ध्वजा सनातन 
शंखध्वनि से पवित्र हो घर आँगन 
दुख दारिद्र्य हरे मंत्रोच्चार गायन 
शुभ संकल्पित हो कलश स्थापन 
नव संवत्सर स्वागतम !
नव संवत्सर स्वागतम !

जीर्ण शीर्ण को त्याग रही उपवन 
प्रकृति ओढ़ रही हरित नव वसन 
आह्लादित हो रही है अल्हड़ पवन 
पीतपर्ण झड़े,उग रही कली सुमन 
नव संवत्सर स्वागतम !
नव संवत्सर स्वागतम !

उमंग उल्लास बढ़ा रही नव चेतन 
वासंतिक छटा मनहर नव चिंतन 
शुभ ऊर्जा भाव से सजे नव सृजन 
सुखद संयोग लाए यह वर्ष नूतन 
नव संवत्सर स्वागतम !
नव संवत्सर स्वागतम !

गौरवमय इतिहास का करें अनुसरण 
सब भारतीय संस्कृति का रखें स्मरण 
निभाकर अपनी परंपरा और आचरण 
सहर्ष करें भारतीय नववर्ष में पदार्पण
नव संवत्सर स्वागतम !
नव संवत्सर स्वागतम !

- मनीषी सिन्हा 
- गाजियाबाद , उ॰ प्र॰
- ⁠स्वरचित , अप्रकाशित

Thursday, April 4, 2024

अन्जू परिहार

*नया दिन है नया सवेरा*
नया दिन है नया सवेरा
अंखियों से उड़ गया अंधेरा
मुबारक हो नया साल दोबारा..।

ब्रम्हा जी ने रची सृष्टि की रचना
तभी कहलाया हिन्दू नववर्ष अपना
लेके आया अनेक त्यौहारों का खजाना..।

चारों तरफ फैला खुशियों का उजाला
गुडीपडवा लेकर नया साल था आने वाला
मन मैरा हो गया बडा़ ही मतवाला..।

पहला चैत्र माह का महिना आया
अपने साथ रंगों की है सौगात लाया
द्वार पर मैने रंगोली को है सजाया..।

मैरा मन हर्षोल्लास से भर आया
सतरंगी मिठाइयों से है थाल सजाया
मेहमानों को खूब खिलाया पिलाया..।

स्कूलों के नये सत्र की हो गयी तैयारी
लहलहाई फसलें कट गयी सारी की सारी
सब घरों मे आ गयी है खुशियों की बारी..।

बसंत ऋतु का हुआ है आगमन
लिये माँ दुर्गा स्वरूपो की साधना
नये साल से मन हो गया अतिपावन..।

आशाओ की नई किरण के साथ
जिंदगी में लाये खुशियों की सौगात
क्योंकि हो गयी है नये साल की शुरुआत..।

- अन्जू परिहार
 शाहजहांनाबाद, भोपाल, मध्यप्रदेश।

श्रीमती सुमा मण्डल

नववर्ष की महिमा

चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ,कहते गुडी पाडवा, युगादि, संवत्सरारंभ।
कहते हैं इसे वर्ष प्रतिपदा,बसंत ऋतु प्रारंभ दिन, विक्रम संवत् वर्षारंभ।

इस दिन को नववर्ष मनाने के हैं, नैसर्गिक, एतिहासिक ,आध्यात्मिक कारण।
इसी दिन राम जी का हुआ था राज्याभिषेक,
किए थे प्रभु राज मुकुट धारण।

इसी दिन अयोध्या में श्री राम जी के, विजयोत्सव का आनंद था लहराया।
अयोध्या में घर-घर के द्वार-द्वार पर, धर्म-ध्वज गया था लोगों द्वारा फहराया।

प्रतीक स्वरूप इसी के, धर्म- ध्वज इस दिन आज भी फहराया जाता है।
गुडी का अर्थ होता है विजय पताका, महाराष्ट्र में गुडी पाडवा कहलाता है।

कहते हैं चारों युगों में सतयुग का,आरंभ भी इसी तिथि को हुआ था।
श्री कृष्ण की विभूति स्वरूप बसंत ,धरा को इसी तिथि को छुआ था ।

वृक्षों पर नये-नये कोंपलों का ,हो जाता है इसी दिन से शुरू आना।
कोयलें भी कुहु-कुहू कर सुनाने लगती हैं, मधुर तान से फिर गाना।

उल्लास, उमंग, खुशी और चारों तरफ पुष्पों की फैल जाती है सुगंधि।
भौंरों का गुंजार, मंद गति से पवन बह  कर,जैसे करें बसंत संग संधि।

मान्यता इसके पीछे है कहा जाता, विद्वानों के द्वारा है एक यह भी।
किये थे इसी दिन से शुरू, ब्रह्माण्ड का निर्माण सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी।

सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी के द्वारा, निर्मित होने के कारण यह ब्रह्माण्ड।
कहते हैं इस ब्रह्माण्ड को ब्रह्माण्ड, नाम पड़ा ब्रह्माण्ड का ब्रह्माण्ड।

कहते हैं सृष्टि की रचना भी इसी दिन से, सृष्टि कर्ता ब्रह्मा किए थे शुरू।
ब्रह्मा जी सृष्टक, विष्णु जी पालक, शिव जी संहारक इस सृष्टि के गुरु।

इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने, शंका पर विजय प्राप्त कर लिया।
चिरस्थाई बनाने उस विजय को, फिर विक्रम संवत प्रारंभ कर दिया ।

शालिवाहन राजा ने भी इसी दिन, अपने शत्रु पर विजय पाई थी।
और फिर इसी दिन से, शालिवाहन पंचांग शुरू कर के चलाई थी ।

इसी तिथि को प्रभु श्री राम जी, बालि का वध कर राज्य सुग्रीव को दिए।
इसी तिथि को युधिष्ठिर जी का भी, राजतिलक हैं करूणा सिंधु ने किए।

इस दिन प्रातः नित्यकर्म कर, तेल का उबटन लगाकर स्नान करते हैं।
नवीन वस्त्र धारण कर सब , अपने मन को आनंद,उल्लास से भरते हैं।

घर को ध्वज, पताका, बंदनवार आदि, शुभ सामाग्रियों से सजाया जाता है।
प्रेम पूर्वक मिलकर सबसे नूतन वर्ष का, बधावा बजाया जाता है।

प्रथम पूजनीय गणेश जी की पूजा, करते हैं इस दिन व्यापारी गण।
पुरानी बहीखाता बदल कर अपनी ,बनाते हैं बहीखाता पुनः नूतन ।

इस दिन नवरात्रि की भी होती है, भक्तों द्वारा कलश की स्थापना।
नौ दिनों तक चलती है फिर ,भक्ति- भाव से माता रानी की साधना।

नवमी तिथि को किया जाता है, नौ कन्या पूजन कर व्रत का पारायण।
मां से मांगूं नित मैं तो अपना अराध्य, अखिल ब्रह्माण्ड नायक नारायण।

       रचयिता -श्रीमती सुमा मण्डल
       वार्ड क्रमांक 14 पी व्ही 116
       नगर पंचायत पखांजूर
       जिला कांकेर छत्तीसगढ़
       पिन कोड 494776
       मोबाइल नंबर 6266961542

Wednesday, April 3, 2024

नीना महाजन नीर

नव वर्ष 




नव वर्ष की 
 प्रथम रश्मि का 
          करें अभिनंदन... 

 शुभ स्वरों से बजे शंख..
 मधुर प्रफुल्लित,
 नव चिंतन से हो
 दुष्ट प्रवृत्तियों का अंत…

नव वर्ष में हो…
         नयी सोच 
          नया जोश 
    नया गीत 
   नया संगीत 
          नयी ऊर्जा 
          नयी  उमंग...

लाए नव वर्ष 
हमारे जीवन में..
खुशियां ,उत्साह
        और हर्ष...




नीना महाजन नीर
गाजियाबाद
उत्तर प्रदेश

सच्चिदानन्द तिवारी शलभ

नव संवत्सर की शुभकामनाएं
-------------------------------------

दिवसास्त आपके हंस कर हों
------------------------------------
प्रति ऋतु,मास,प्रतिक्षण,
शुभ श्रेयस्कर हों,
सर्व समुद्र,शैल,सर,सरित,
सुयशकर हों.
श्रुति, स्मृति,शुचि धर्म,
सुरक्षा करें आपकी,
दिवसोदय,दिवसास्त,
आपके हॅऺस कर हों.

सच्चिदानन्द तिवारी शलभ 
(लखनऊ)
मोबाइल सं. -7007959446

अलका बालियान

नवोत्कर्ष  

दिनकर ने ली अंगड़ाई,
नववर्ष की किरणें उत्साही,
कोयल ने कूक सुनाई,
आमों पर बौर लगे हैं भाई,
खेतों में सरसों लहराई,
किसलयों की बहार आई,
बसंतोत्सव के इस उत्सव में,
जीवों ने आवाज लगाई,
चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा में 
नवसंत्सर की बेला है आई,
प्रकृति के नव सृजन ने,
हरितिमा की हुंकार लगाई | 
नवऊर्जा, नवउल्लास, नवोत्कर्ष है भाई,
घर-द्वारों पर रंगोली सजाई,
बंदनवारों संग ध्वज पताका लहराई,
हिन्दू संस्कृति गौरान्वित हो आई........
दिनकर जी की जागृति का जश्न है माई .......
विश्व गुरु बनकर अपनी सभ्यता संजोई,
मंगल नववर्ष मनाने की घड़ी है आई |
मंगल नववर्ष मनाने की घड़ी है आई |
-अलका बालियान (आणंद) गुजरात 
-लेखिका (शिक्षिका)

राही राज़

नव वर्ष 

हर्ष उत्तकर्ष के साथ नव वर्ष आया,
चैत के प्रारम्भ से नव वर्ष आया,
आया खुशी और उल्लास आया,
जोशो खरोश के साथ नव वर्ष आया ll

चैती दुर्गा पूजा का  निमंत्रण आया,
चैती छठ का पर्व आया,
आया त्यौहार मन में उमंग छाया,
जीवन का सुखद पल आया l

गया मातम, गया पतझड़,
हंसी और खुशी के साथ फूल खिलखिलाया,
हिमालय से पिघला बर्फ
और धरा पर मुस्कुराया ll

बदल रहीं है काया,
बदल गई है माया,
बदल रहा है मौसम ,
देखो ना सावन आया  l

हर्ष उत्तकर्ष के साथ नव वर्ष आया,
चैत के प्रारम्भ से नव वर्ष आया  ll

राही राज़
बेंगलूरू
26/3/23

रतन किर्तनिया

चाँदनी रात
सायंकाल का प्रहर -
जिसे देती विदाई कोई ;
सुरबाला सी नारी -
पहन के सफेद साड़ी ,
विदाई दे रही है -
सज -धजकर ;
लेता विदाई दिनकर -
नींद की तैयारी में ;
सजाकर उस का बिस्तर ,
हो रही चाँदनी का यौन विस्तार ।

आई प्रदोष प्रहर -
सुरबाला नारी ;
बैठी सज - धजकर -
पहनी सफेद साड़ी ,
फैलाती रुप का ज्योति -
करती रुप में सृष्टि को लिप्त ,
आ रही चाँदनी परी -
संग में चमकीला रंग में तारा एक ;
अभिनन्दन में उसकी -
नभ को सजाती तारें अनेक ;
करती रात रानी की अभिषेक ;
फैलाती ज्योति चाँदनी रात ;
वह करती सृष्टि को शत् - रात् ,
हँस - हँस कर करती रानी का गुनगान ;
चारु चाँद की चंचल आँचल ,
खुली चमकीला नील गगन -
मृदु - मृदु चाँद की चंचल किरण ;
मीठी - मीठी बहती ठंडी पवन -
गढ़ें मुर्दों को ना जगाओं -
उर में यादों की अनल ना लगाओं ,
कहें दो ! उसे ना आऐ लौटके :
चूर - चूर होके बिखर गया ! टूट के ,
हे यादें ! रहो हम से दूर -
रोने के लिए मत करो मजबूर ,
उर टूटके हुआ चूर - चूर ।


निशिथ प्रहर का होता आगमन ;
निराश ! रोता पुहुपन ,
यादों की बारात में -
ना खेलों ! ऐसा खेल रात में ,
चाँदनी तुझे किस कारण है इतनी अभिमान ?
सुन रे बेईमान -
ले के ही छोड़ेगी ! मेरा प्राण ;
आँख मिचौली खेल में ;
किरण - छाँय की मेल में ;
छुपके - चुपके चला रही बाण ;
निकल जाएगा प्राण ,
मर ही जाऊँगा इस बार -
मुझ पे हुआ ऐसा वार ,
नासूर बना घाँव -
यादों की ज़न्जीरों से बन्धा पाँव ,
काँटों से सजा अपना बिस्तर -
करुँ कहानी का विस्तार -
अत्रुनीर से भीगा बिस्तर ,
रिमझिम - रिमझिम बरसे आग -
सृष्टि को जलाती विरहाग ;
जल - थल - नल को समेटा -
चारु चाँद की चंचल आँचल में सब को गठा ,
शांत सागर की उर में उठी तरंगाघात -
गूँज रही दसों दिशाओं में गुफ्तबात ;
मर्मर में छिपी है कोई अनुराग ;
सृष्टि आज जल जाएगा - 
हो जाएगा राक ,
दिवस में देखा हँसती बाग को -
देख रहा हूँ ! जलती विरहाग्नि में बाग को ;
कोई तो बुझाओं - इस आग को ;
कितना प्रफुल्लित था सुमन -
जीवन चल रहा था एक प्रेम दिशा में ;
सब कुछ जल रहा -
चाँद की चारु चंचल किरण वाली निशा में ।


आ गया त्रिमाया प्रहर -
रुक - रुक के नदी - नद में उठ रही हैं लहर ;
सुरसरिता में बसा एक भूखा - प्यासा मकर -
जल में ना मिला जल ; ना मिला आहार  ,
मर जाएगा भूख  - प्यास से तड़प - तड़पकर ;
जैसे कोई तड़पता ! प्रेमी - प्रेमिका से बिछड़कर !
जल ! जली विरहाग में -
गाता गीत विरह राग में ;
सृष्टि जलती पूरा विरहाग में ,
जुगनू जलती ! जलाती टिम - टिमकर -
लाती खुशबू ऐसी ! रे पवन -
बोलती अव्यक्त प्रेम संदेश ;
हे प्रिय ! तुम कहाँ हो -
तुम्हारा है कौन सा देश ;
व्याकुल हुआ मेरा मन -
इस जीवन की इतनी सी है अभिलाषा ;
मैं कर लूँ ! प्रिय की दर्शन ।


उषा प्रहर का आगमन -
किसे ! क्यों खोजता मेरा मन ?
झम - झम करती कोई दूर से -
प्रिय की नुपूरों की सुर से ;
मुझे बुलाती विरह सुर से ,
होकर व्याकुल स्निग्धज्योत्सना रात  में ;
मैं खोजता रहा धुँधली रात में ;
घायल मजनू की तरह -
हे प्रिय ! इस सृष्टि में अकेला हूँ ;
छोड़ कर ना जाओं दूर -
उर को ना करो चूर - चूर !
कोई तो बताओं -
कहाँ बज रही है नुपूर -
बढ़ता - बढ़ाता ! मन का अनुराग ;
चाँद की चंचल किरण वाली रात में -
उर में लगा प्रेमाग ;
ना मिला उसे ! सिर्फ मिली प्रेमाभाष ;
खो रहा धैर्य ! कर ना मुझे विवश -
मन में जल रहा है आग -
अत्रु से बुझाया आग को ;
बचा लिया अपने बाग को -
अत्रुनीर सिंचकर खिलाया -
इस जीवन में -
कवि ने अपने कविता की बाग को ।

             रतन किर्तनिया
                छत्तीसगढ़
             जिला :- काँकेर
          पखांजुर (रविन्द्रनगर )
     पोस्ट :-  P V 17 ( रविन्द्रनगर )
        पिन कोड :- 494776

श्रीमती अरुणा अग्रवाल

शीर्षक "हिन्दू नव वर्ष "
***********************
01,03,2024,

चैत्र माह प्रतिपदा है पावन,
शुरू होता हमारा नया सालधन
व्यापारीगण,अग्रवाल बंधुऔं के  लिए है सुखद,श्रीसमृद्धि,गजानन।।

नया खाता बहि का होता पूजन
नया कारोबार का भी श्रीगणेश
लाभ,हानि का करें लेखाजोखा
अंग्रेजी वर्ष से न तालुकात। ।

रामधारी दिनकर प्रबल विरोधी,
क्या जरूरत है कि पाश्चात्य का
अंधानुकरण,जब खुद-ब-खुद,
हमारा है राष्ट्रीय कैलेण्डर,राम।।

जनवारी को नया साल का जश्न
उन्हौने उठाया था विरोध,प्रश्न,
हमारा भारतवर्ष है सर्वोत्तम,
इसे नहीं आवश्यकता कोई,दुजा।।


प्राच्य का पाश्चात्य सभ्यता,से,
अनुकरण,रात्रि जागरण,मदिरा 
पान,अर्धनग्न पोशाक,पहनावा,
कतई नहीं शीलता का प्रतिनिधि।।

रामायण,महाभारत,गीता-वाणी
साक्षात है सर्वोच्च,धर्म-परायण
हमारा सभ्यता,संन्कृति,उत्तम,
चिर पूरातन नित्य नूतन,संम्बदसर।।

दिनकर जी का वेवाक वाणी,
आज की परिप्रेक्ष्य में सटीक,
सालों पहले का आंकलन,कवि,
शिरोमणि,है सत्यपरक,अमूल्य निधि।।


प्रेषिका 
श्रीमती अरुणा अग्रवाल
लोरमी, जिला मुंगेली, छ, ग,
संपर्क: 9981830087


शीर्षक "चैत्र शुक्ल प्रतिपदा"
************************
03,04,2024,

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है सुहाना,
भारतीय नववर्ष का आगमन,
प्रकृति में नया यौवन विहार,
सरसों फूल पीला लगे मनोहर।।

प्रकृति का देख रूप मनहरण
कविवर दिनकर प्रसन्नचित्त-मन
मानो हरा सारी,पीला है किनारा
ईश्वर का कायानात,अलौकिक।।

अंग्रेजी नववर्ष का नहीं काम,
प्राच्य है विकासशील,उत्तम,
पाश्चात्य का न करो अनुकरण
नैतिक अधोपतन का है कारण।।

आर्यावर्त का सभ्यता,संन्सृति,
शिखरस्त है लिऐ नव जागृति
विश्व-गुरू है और रहेगा सदा,
अन्नपूर्णा का बास है सर्वदा।।

यूनान,रोमा,मिश्र का पतन,
पर मेरा भारत है सर्वोच्च-धन
किसी आततायी में नहीं दम,
नव संवत्सर,का हो स्वागत-राम।।

प्रेषिका 
श्रीमती अरुणा अग्रवाल
लोरमी, जिला मुंगेली, छ, ग,
संपर्क: 9981830087

रमेश साहू

चैत्र मास की चांदनी रात।
करने लगें जुगनुए आपस में बात।।
होती रहे सदा हमारी ऐसे ही मुलाकात।
कुछ गुफ्तगू हो और हो कुछ मुक्कालात।।

भौरा बन के मैं इधर उधर मंडराता रहूं।
फूल फूल कालिया के पास मैं जाता रहूं।।
लोक लाज शर्मो हया को मैं बेच खाऊं।
इश्क की गली में मैं चाहें दिन रात बदनाम होता रहूं।।

वन वन खिले उपवन वन खिले।
गुन गुनगुनाए भौरे कलियों से जा मिले।।
रंग भेद हैं नही कुछ हरा लाल पीले।
चार दिन की हैं तो जी भर के जवानी जिले हैं।।
प्रकृति ने किया शृंगार देखो देखो आया चैत्र का महीना।
बगिया में छाई बाहर देखो देखो आया चैत्र का महीना।।

अमुआ की डाली में अमुआ रे झूले।
इमली की खटास देखो मुंह में रे घुले।।
शीतल जल ने रे मन की बुझाई प्यास।
प्रकृति ने किया शृंगार देखो देखो आया चैत्र का महीना।
बगिया में छाई बाहर देखो देखो आया चैत्र का महीना।।


रमेश साहू
मुंगेली छत्तीसगढ़

Monday, April 1, 2024

श्रवण सिंह राव

कविता

शीर्षक= भारतीय हिंदू नव वर्ष

भुलकर हमें पुरानी बातों को हमें मिलकर नव वर्ष मनाना है
एक नए लक्ष्य को पाना है
अपने परंपरा संस्कृति पर हमें गर्व करना है
एक नया ही इतिहास रचना है!


कठिन समय को भी हमें सरल बनाना है
भगवान की अटूट भक्ति में विश्वास करना है
हमें अपने कार्य करते रहना है हार नहीं मानना है!

नए वर्ष में हमें यश ,कीर्ति सम्मान प्राप्त करना है
हमें अपने जीवन को उत्साह, उमंग भक्ति, आत्मविश्वास के रंग से भरना है!

जीवन के नए रास्ते पर हमें ही आगे बढ़ते रहना है हमें अपने जीवन के हर क्षण को खुशियों से भरना है
हमें तो बस इतिहास बनाना ही है हमें

 अपनी आन ,बान ,शान पर  हमें गर्व करना ही है सभी भारतीयों को मिलकर खुशी से अपने त्यौहार, हमें अपने नव वर्ष को मनाना ही  है!!


श्रवण सिंह राव आहोर जिला जालौर राजस्थान 👆🙏

छाया शाह *"सख्य"*

नववर्ष  पती पती देखो कैसी कोंपलें फुटी है, धरती को सजाने सारी प्रकृति जुटी है। धूले प्रेम के रंग में यह नववर्ष कहेलाता,  चैत्री एकम निले वस्...