नववर्ष
पती पती देखो कैसी कोंपलें फुटी है,
धरती को सजाने सारी प्रकृति जुटी है।
धूले प्रेम के रंग में यह नववर्ष कहेलाता,
चैत्री एकम निले वस्त्र पे गुलाबी बुटी है।
मंगलमय स्वागत हो मौसम है अलबेला,
कोयल गा रही, प्रकृति सज के लूटीं है।
हो जग का उत्थान लगे स्वर्ग समान,
हरी भरी धरती लगती स्वर्ण में घूंटी है।
सभ्यता अपनी "सख्य" देती है बधाई नववर्ष की,
स्फटिक सी संस्कृति प्रकाश पुंज कोटी है।
छाया शाह *"सख्य"* मुंबई
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