यही तो है मेरा नया साल
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सृष्टि के नव श्रंगार का,
संदेश दे रहा देश-काल।
हां यही तो है, मेरा नया साल।।
कहीं गुड़ी पड़वा, कहीं नवरेह,
कहीं चेटीचंड, तो कहीं युगाधी।
उत्सव ये नया नहीं,
परंपरा है आदि।।
पेड़, पौधे, पुष्प, लताएं,
सुनाते हैं जिसका हाल।
हां यही तो है, मेरा नया साल।।(१)
यह सृष्टि की आरंभ तिथि,
आदिकाल की यही है रीति।
भारत भूमि से, राजा विक्रम ने,
शक हूणो को दिया था निकाल।
हां यही तो है, मेरा नया साल।।(२)
गुरु अंगद देव का जन्म हुआ,
प्रगट हुए झूलेलाल।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने,
लाया वैदिक काल।।
पंचांग आरंभ और शक्ति आराधन से,
हुआ यह जगत निहाल|
हां यही तो है, मेरा नया साल||(३)
विक्रम संवत, दो हजार इक्यासी।
दुनिया तेरे, दरस की प्यासी।।
गुडी, सजाने, ध्वजा लहराने,
तोरण द्वार सजाने के
स्वप्न से हुआ मै निहाल।
हां यही तो है, मेरा नया साल।।(४)
स्वरचित-
© कमल पटेल चकरावदा।
उज्जैन (मध्य प्रदेश)
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