Saturday, April 6, 2024

प्रभु पग धूल

दोहा
छंदाधारित मुक्तक
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1-
चैत्र-शुक्ल की प्रतिपदा,
इक्यासी-है बीस।
शुचित-गुड़ी पड़वा हरे,
रोग-दोष छत्तीस।।
हिंदी के नव-वर्ष में,
मिली मित्र नव-रात्रि।
देता हूँ शुभ-कामना,
कटें-कष्ट चालीस।।
2-
ऋतु बसंत की साथ में,
रही चैन-सुख घोल।
नहीं-देर का काम है,
राधा-मोहन बोल।।
पावन-हिंदी वर्ष है,
पावन-है मधुमास।
ब्रम्हा-जी ने आज ही,
रची-सृष्टि-अनमोल।
3-
हिंदी के नव-वर्ष पर,
छोडो काले-कर्म।
दीनों-की सेवा करो,
खिले-पुष्प सा धर्म।।
मद-पावक से दूर रह,
करे-आप को भस्म।
धर्म-पुण्य करते रहो,
पाकर-प्रभुपग मर्म।।
4-
मंगल-राजा प्रेम से,
ले-आये नव-वर्ष।
मंगल-ने मंगल किया,
भरा-सृष्टि में हर्ष।।
झूम-झूम कर नाचिये,
छाया सुखद-बसंत।
मंगल-राजा कह रहे,
नित्य-करो-उत्कर्ष।।
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प्रभुपग धूल

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