चाँदनी रात
सायंकाल का प्रहर -
जिसे देती विदाई कोई ;
सुरबाला सी नारी -
पहन के सफेद साड़ी ,
विदाई दे रही है -
सज -धजकर ;
लेता विदाई दिनकर -
नींद की तैयारी में ;
सजाकर उस का बिस्तर ,
हो रही चाँदनी का यौन विस्तार ।
आई प्रदोष प्रहर -
सुरबाला नारी ;
बैठी सज - धजकर -
पहनी सफेद साड़ी ,
फैलाती रुप का ज्योति -
करती रुप में सृष्टि को लिप्त ,
आ रही चाँदनी परी -
संग में चमकीला रंग में तारा एक ;
अभिनन्दन में उसकी -
नभ को सजाती तारें अनेक ;
करती रात रानी की अभिषेक ;
फैलाती ज्योति चाँदनी रात ;
वह करती सृष्टि को शत् - रात् ,
हँस - हँस कर करती रानी का गुनगान ;
चारु चाँद की चंचल आँचल ,
खुली चमकीला नील गगन -
मृदु - मृदु चाँद की चंचल किरण ;
मीठी - मीठी बहती ठंडी पवन -
गढ़ें मुर्दों को ना जगाओं -
उर में यादों की अनल ना लगाओं ,
कहें दो ! उसे ना आऐ लौटके :
चूर - चूर होके बिखर गया ! टूट के ,
हे यादें ! रहो हम से दूर -
रोने के लिए मत करो मजबूर ,
उर टूटके हुआ चूर - चूर ।
निशिथ प्रहर का होता आगमन ;
निराश ! रोता पुहुपन ,
यादों की बारात में -
ना खेलों ! ऐसा खेल रात में ,
चाँदनी तुझे किस कारण है इतनी अभिमान ?
सुन रे बेईमान -
ले के ही छोड़ेगी ! मेरा प्राण ;
आँख मिचौली खेल में ;
किरण - छाँय की मेल में ;
छुपके - चुपके चला रही बाण ;
निकल जाएगा प्राण ,
मर ही जाऊँगा इस बार -
मुझ पे हुआ ऐसा वार ,
नासूर बना घाँव -
यादों की ज़न्जीरों से बन्धा पाँव ,
काँटों से सजा अपना बिस्तर -
करुँ कहानी का विस्तार -
अत्रुनीर से भीगा बिस्तर ,
रिमझिम - रिमझिम बरसे आग -
सृष्टि को जलाती विरहाग ;
जल - थल - नल को समेटा -
चारु चाँद की चंचल आँचल में सब को गठा ,
शांत सागर की उर में उठी तरंगाघात -
गूँज रही दसों दिशाओं में गुफ्तबात ;
मर्मर में छिपी है कोई अनुराग ;
सृष्टि आज जल जाएगा -
हो जाएगा राक ,
दिवस में देखा हँसती बाग को -
देख रहा हूँ ! जलती विरहाग्नि में बाग को ;
कोई तो बुझाओं - इस आग को ;
कितना प्रफुल्लित था सुमन -
जीवन चल रहा था एक प्रेम दिशा में ;
सब कुछ जल रहा -
चाँद की चारु चंचल किरण वाली निशा में ।
आ गया त्रिमाया प्रहर -
रुक - रुक के नदी - नद में उठ रही हैं लहर ;
सुरसरिता में बसा एक भूखा - प्यासा मकर -
जल में ना मिला जल ; ना मिला आहार ,
मर जाएगा भूख - प्यास से तड़प - तड़पकर ;
जैसे कोई तड़पता ! प्रेमी - प्रेमिका से बिछड़कर !
जल ! जली विरहाग में -
गाता गीत विरह राग में ;
सृष्टि जलती पूरा विरहाग में ,
जुगनू जलती ! जलाती टिम - टिमकर -
लाती खुशबू ऐसी ! रे पवन -
बोलती अव्यक्त प्रेम संदेश ;
हे प्रिय ! तुम कहाँ हो -
तुम्हारा है कौन सा देश ;
व्याकुल हुआ मेरा मन -
इस जीवन की इतनी सी है अभिलाषा ;
मैं कर लूँ ! प्रिय की दर्शन ।
उषा प्रहर का आगमन -
किसे ! क्यों खोजता मेरा मन ?
झम - झम करती कोई दूर से -
प्रिय की नुपूरों की सुर से ;
मुझे बुलाती विरह सुर से ,
होकर व्याकुल स्निग्धज्योत्सना रात में ;
मैं खोजता रहा धुँधली रात में ;
घायल मजनू की तरह -
हे प्रिय ! इस सृष्टि में अकेला हूँ ;
छोड़ कर ना जाओं दूर -
उर को ना करो चूर - चूर !
कोई तो बताओं -
कहाँ बज रही है नुपूर -
बढ़ता - बढ़ाता ! मन का अनुराग ;
चाँद की चंचल किरण वाली रात में -
उर में लगा प्रेमाग ;
ना मिला उसे ! सिर्फ मिली प्रेमाभाष ;
खो रहा धैर्य ! कर ना मुझे विवश -
मन में जल रहा है आग -
अत्रु से बुझाया आग को ;
बचा लिया अपने बाग को -
अत्रुनीर सिंचकर खिलाया -
इस जीवन में -
कवि ने अपने कविता की बाग को ।
रतन किर्तनिया
छत्तीसगढ़
जिला :- काँकेर
पखांजुर (रविन्द्रनगर )
पोस्ट :- P V 17 ( रविन्द्रनगर )
पिन कोड :- 494776
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