चैत्र मास की चांदनी रात।
करने लगें जुगनुए आपस में बात।।
होती रहे सदा हमारी ऐसे ही मुलाकात।
कुछ गुफ्तगू हो और हो कुछ मुक्कालात।।
भौरा बन के मैं इधर उधर मंडराता रहूं।
फूल फूल कालिया के पास मैं जाता रहूं।।
लोक लाज शर्मो हया को मैं बेच खाऊं।
इश्क की गली में मैं चाहें दिन रात बदनाम होता रहूं।।
वन वन खिले उपवन वन खिले।
गुन गुनगुनाए भौरे कलियों से जा मिले।।
रंग भेद हैं नही कुछ हरा लाल पीले।
चार दिन की हैं तो जी भर के जवानी जिले हैं।।
प्रकृति ने किया शृंगार देखो देखो आया चैत्र का महीना।
बगिया में छाई बाहर देखो देखो आया चैत्र का महीना।।
अमुआ की डाली में अमुआ रे झूले।
इमली की खटास देखो मुंह में रे घुले।।
शीतल जल ने रे मन की बुझाई प्यास।
प्रकृति ने किया शृंगार देखो देखो आया चैत्र का महीना।
बगिया में छाई बाहर देखो देखो आया चैत्र का महीना।।
रमेश साहू
मुंगेली छत्तीसगढ़
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